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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का अल्पसंख्यक दर्जा रहेगा बरकार: सुप्रीम कोर्ट

नई दिल्ली: अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) की स्थापना साल 1875 में सर सैयद अहमद ख़ान की अगुवाई में मुस्लिम समुदाय के लोगों द्वारा मोहम्मडन एंग्लो-ओरिएंटल कॉलेज के रूप में की गई थी। करीब 55 साल बाद 1920 में इसे विश्वविद्यालय में तब्दील कर दिया गया। सुप्रीम कोर्ट ने आज शुक्रवार को अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (AMU) के अल्पसंख्यक दर्जे पर अपना फैसला सुनाते हुए एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा बरकरार रखा है। फैसला सुनाते वक्त सीजेआई चंद्रचूड़ ने कहा कि चार जजों की एक राय है। मैंने बहुमत लिखा है जबकि 3 जजों की राय अलग है। जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शर्मा ने अपनी असहमति लिखी है और इस तरह से यह फैसला 4:3 से तय किया गया है।


इसके अधिनियम में 1951 और 1965 में संशोधन किए गए। इसके बाद से ही यहां विवाद शुरू हो गया। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तो 1967 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे सेंट्रल यूनिवर्सिटी माना। कोर्ट ने कहा कि इसे अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना जा सकता। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चूंकि इसकी स्थापना केंद्रीय अधिनियम के तहत हुई है। इसके बाद विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। 1981 में एएमयू को अल्पसंख्यक का दर्जा देने वाला संशोधन हुआ। इस मामले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। 2005 में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 1981 के एएमयू संशोधन अधिनियम को असंवैधानिक करार देते हुए इसे रद्द कर दिया। लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के उस फ़ैसले को बदल दिया है और AMU को संवैधानिक करार दिया।